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19 मिनट पहलेलेखक: आशीष तिवारी

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डायरेक्टर सुजीत सरकार ऐसी फिल्में बनाते हैं, जिसमें कोई ना कोई मैसेज जरूर होता है। ‘पीकू’ के बाद सुजीत सरकार ने फिल्म ‘आई वांट टू टॉक’ में एक बार फिर एक बाप-बेटी की दिल को छूने वाली कहानी लेकर आए हैं। अभिषेक बच्चन स्टारर यह फिल्म थिएटर में रिलीज हो चुकी है।

हाल ही में सुजीत सरकार ने दैनिक भास्कर से खास बातचीत की। इस दौरान उन्होंने कहा कि अगर ‘आई वांट टू टॉक’ जैसी फिल्मों को सपोर्ट नहीं मिलेगा, तो हम जैसे निर्देशकों को हिम्मत नहीं आएगी।

बातचीत के कुछ खास अंश पढ़िए..

सवाल- ‘आई वांट टू टॉक’ के बारे में कुछ बताएं?

जवाब- यह ऐसी फिल्म है जो बाप-बेटी के रिश्ते को याद दिलाती है। जब मैंने फिल्म पर काम शुरू किया तो मुझे मेरी बेटी के साथ रिश्ते की याद आ गई। अभिषेक बच्चन को जब कहानी सुनाई थी तब उनको आराध्या के साथ रिश्ते की याद आ गई। हम सब की बेटियां हैं, कहीं ना कहीं यह कहानी हम सबको कनेक्ट करती है। हालांकि, बाप-बेटी के रिश्ते पर ‘पीकू’ बना चुका हूं, लेकिन उससे यह फिल्म काफी अलग है।

सवाल- यह फिल्म आपके लिए कितनी स्पेशल है?

जवाब- मेरे लिए यह बहुत ही स्पेशल फिल्म है। लोग कहते हैं कि बॉलीवुड में अच्छी फिल्में नहीं बनती हैं। मैं ऐसी फिल्म लेकर आया हूं, जिसे चाहता हूं कि दर्शक सपोर्ट करें। अगर ऐसी फिल्मों को दर्शक सपोर्ट नहीं करेंगे तो हम जैसे निर्देशकों को ऐसी फिल्में बनाने की हिम्मत नहीं आएगी।

सवाल- आपकी पहली फिल्म ‘यहां’ से लेकर ‘आई वांट टू टॉक’ की बात करें, तो शहर भी एक किरदार की तरह दिखता है?

जवाब- मैं हर शहर को अपने नजरिए से देखता हूं। अगर मैं दिल्ली की ही बात करूं तो अपनी फिल्मों में दिल्ली को 3-4 तरीके से पेश किया है। ‘विक्की डोनर’ में दिल्ली कलरफुल दिखा। ‘पीकू’ में बंगाली कॉलोनी का एक अलग ही रंग दिखा। ‘पिंक’ में डार्क दिल्ली को पेश किया। ‘अक्टूबर’ में विंटर दिल्ली देखने को मिला। मैं दिल्ली में 17 साल रहा हूं। मैंने उसके अलग-अलग रंगों को देखा है। ‘आई वांट टू टॉक’ में भी शहर एक किरदार के रूप में दिखेगा।

सवाल- करियर की सबसे चुनौतीपूर्ण क्या बात रही है?

जवाब– सबसे बड़ी चुनौती अपनी शर्तों पर फिल्म बनानी रही है। मैं कोशिश करता हूं कि किसी तरह का समझौता ना करूं। मेरा मानना है कि अगर आप किसी चीज को कन्विक्शन के साथ पेश करेंगे तो लोगों को क्यों नहीं पसंद आएगा? आध्यात्मिक गुरु जब कन्विक्शन के साथ कोई बात कहते हैं तो हम मानते हैं ना।

सवाल- सिनेमा से आपका परिचय कब हुआ?

जवाब- सत्यजीत रे की फिल्मों का मेरे ऊपर बहुत ही गहरा असर रहा है। बचपन में पिता जी के साथ सत्यजीत रे की कई फिल्में देखी, लेकिन तब सिनेमा की उतनी समझ नहीं थी। 22 की उम्र में जब उनकी फिल्म ‘पाथेर पांचाली’ देखी, तब बहुत रोया था। उसके बाद मैंने सत्यजीत रे की कई फिल्में देखी। वहां से सिनेमा से मेरा परिचय हुआ, जो मेरे लिए एक अलग दुनिया थी।

बचपन में प्रेमचंद को बहुत पढ़ा, तब कुछ समझ में नहीं आया। सत्यजीत रे की फिल्में देखने के बाद जब मैंने दोबारा प्रेमचंद को पढ़ना शुरू किया तो भावुक हो गया। फिर धर्मवीर का नाटक ‘अंधा युग’ पढ़ा। अचानक मेरा जीवन बदल गया, लेकिन फिल्म मेकर बनने के बारे में तब तक नहीं सोचा था। हां, थिएटर की तरफ झुकाव जरूर हो गया था।

सवाल- तब आप दिल्ली के ‘ली मेरिडियन’ होटल में एकाउंटेंट के रूप में काम कर रहे थे। जब आपने पेरेंट्स को बताई कि थिएटर की वजह से नौकरी छोड़ दी, तब उनके क्या रिएक्शन थे?

जवाब- 1992 की बात है। उस समय फाइव स्टार होटल में नौकरी मिलनी बहुत बड़ी बात थी। मैंने पेरेंट्स को तुरंत यह बात नहीं बताई, नहीं तो सदमे में आ जाते। कुछ ना कुछ काम करके घर पर पैसे देते रहा। एक दिन मां को शक हो गया तो उनको बता दिया। पिता जी को कुछ दिनों के बाद बताया। वे चिंतित हो गए, उनको नहीं पता था कि थिएटर क्या होता है?

सवाल- थिएटर में आप एक्टिंग भी करते थे?

जवाब- थिएटर में कभी एक्टिंग नहीं किया। मैं बैकस्टेज ही करता था। एन के शर्मा को असिस्ट करता था। एक्टिंग की टेक्नीक, स्टेज पर कैसे रिहर्सल कराते हैं, जैसी बहुत सारी चीजें उनसे ही सीखी है। मैंने दीपक रॉय की डॉक्यूमेंट्री फिल्म में असिस्ट किया।

उसी दौरान सिद्धार्थ बसु से मुलाकात हुई। उस समय वो बहुत बड़े क्विज मास्टर हुआ करते थे। बहुत सारे शोज करते थे। मैं उनमें ऑनलाइन डायरेक्शन में था। उन्होंने मुझे नोटिस और प्रदीप सरकार से मिलवाए। पहली बार सिद्धार्थ बसु ही मुझे मुंबई लेकर आए थे और केबीसी से जुड़ने का मौका दिया। केबीसी के शुरुआत के 10 एपिसोड में ऑनलाइन डायरेक्शन में था।

सवाल- अमिताभ बच्चन से पहली मुलाकात के कैसे अनुभव रहे?

जवाब – मैंने तो कभी सोचा ही नहीं था कि अमिताभ बच्चन से मुलाकात होगी। कोलकाता में ‘याराना’ फिल्म की शूटिंग के दरम्यान बच्चन साहब आए थे। तब मैं बहुत छोटा था। उस समय पूरा कोलकाता झूम रहा था। मैं टीवी में उनको देखता था और अखबारों में पढ़ता था।

मैंने तो कभी कल्पना ही नहीं की थी कि एक दिन केबीसी करूंगा और सामने बच्चन साहब होंगे। बच्चन साहब के साथ ‘पिंक’, ‘पीकू’ और ‘गुलाबो सिताबो’ जैसी फिल्में करना,अपने करियर की बड़ी उपलब्धि मानता हूं। उनके साथ काम करने से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला है। वे आज भी काम को पहले समझते हैं।

सवाल- आप वाइल्ड लाइफ की दुनिया के बहुत करीब रहे हैं, अपने बचपन के बारे में कुछ बताएं?

जवाब– मैं नॉर्थ बंगाल के हाशिमारा एयर फोर्स स्टेशन में बड़ा हुआ हूं। यह जगह जंगलों के बीच है। यहां पर मैं हाथियों के बीच बड़ा हुआ हूं। हाथी मेरे दोस्त थे। उस समय मैं चार साल का था। जैसे ही हाथी का कोई बच्चा पैदा होता था तो वहां ट्रेनिंग के लिए लाया जाता था। उनके साथ हम लोग खेलते थे। हर शनिवार-रविवार पिता जी हाथी पर बैठाकर जंगल में घुमाने ले जाते थे। अभी भी जब कभी जाता हूं तो हाथियों के साथ बैठता हूं।

सवाल- आप डॉग लवर भी हैं, लगता है कि इंसानों से ज्यादा आपको जानवर पसंद हैं?

जवाब- यह सही बात है कि जानवर मुझे बहुत प्रिय हैं। इंसान की चतुराई देख चुका हूं। इसलिए ऐसी फिल्में बनाता हूं, जिसमें कुछ मैसेज हो। मैं सोचता हूं कि सिनेमा के माध्यम से लोगों को कहीं ऐसी जगह पर लेकर जाएं, जहां पर दर्शक नैरो माइंड ना हों।

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