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28 मिनट पहले

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सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) ने हाल ही में बच्चों के लिए फिल्म रेटिंग सिस्टम में कुछ बदलाव किए हैं। CBFC की ओर से UA कैटेगरी में तीन नई रेटिंग श्रेणियां जोड़ी गई हैं। इन बदलावों का उद्देश्य माता-पिता को यह निर्णय लेने में मदद करना है कि कौन सी फिल्म उनके बच्चों के लिए उपयुक्त है।

CBFC की नई कैटेगरी सीबीएफसी अब नए अपडेट के तहत यानी U, UA 7+, UA 13+, UA 16+, और A कैटेगरी में फिल्मों को सर्टिफिकेट जारी करेगा।

U कैटेगरी इस कैटेगरी में फिल्म को सर्टिफिकेट देने का मतलब है कि यह फिल्म सभी उम्र के दर्शक देख सकते हैं। चाहे वे बच्चे हों या बुजुर्ग। वे इस फिल्म को देख सकते हैं।

UA कैटेगरी की सब कैटेगरी इस कैटेगरी को उम्र के आधार पर तीन अलग-अलग वर्गों में बांटा गया है। पहली UA 7+, दूसरी UA 13+, और तीसरी UA 16+। इसका मतलब यह है कि इन कैटेगरी में ऐसी फिल्में शामिल जाएंगी, जो बच्चों के लिए पूरी तरह से प्रतिबंधित नहीं होंगी। लेकिन उम्र के मुताबिक कुछ सावधानी के साथ देखा जाएगा।

UA 7+ कैटेगरी अगर कोई फिल्म इस कैटेगरी में आती है, तो इसका मतलब है कि 7 साल या उससे अधिक उम्र के बच्चे उस फिल्म को देख सकते हैं। हालांकि, माता-पिता यह निर्णय ले सकते हैं कि क्या यह फिल्म उनके छोटे बच्चे देख सकते हैं या नहीं।

UA 13+ कैटेगरी इस कैटेगरी का मतलब है कि ये फिल्में 13 साल या उससे ज्यादा की उम्र के बच्चे देख सकते हैं। लेकिन माता पिता की सहमति के साथ।

UA 16+ कैटेगरी इस कैटेगरी का सर्टिफिकेट पैरेंट्स या गार्जियन को यह गाइड करेगा कि यह फिल्म उनके 16 साल या उससे ऊपर के बच्चों के लिए सही है या नहीं।

A कैटेगरी ​​​​​​​इस कैटेगरी में उन फिल्मों को रखा जाएगा, जो 18 साल या उससे ऊपर की उम्र के लोग देख पाएं।

टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, सीबीएफसी बोर्ड के सदस्यों का कहना है इस नए अपडेट पर कई सालों से चर्चा चल रही थी। इस नए स्ट्रक्चर से ये पक्का हो पाएगा कि सभी फिल्में एक ही कैटेगरी में नहीं जाएं।

क्या है सेंसर बोर्ड सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन, जिसे सेंसर बोर्ड या CBFC भी कहा जाता है, भारतीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की संवैधानिक बॉडी है। ये संस्था 1952 के सिनेमेटोग्राफ एक्ट के तहत फिल्मों के प्रसारण पर नजर रखती है। भारत में सेंसर बोर्ड को दिखाए बिना कोई भी फिल्म आम दर्शकों के लिए रिलीज नहीं की जा सकती है। फिल्म को रिलीज करने से पहले सेंसर बोर्ड से सर्टिफिकेट लेना जरूरी होता है।

कैसे हुआ गठन भारत में पहली फिल्म (राजा हरीशचंद्र) 1913 में बनी। इसके बाद इंडियन सिनेमेटोग्राफी एक्ट 1920 में बना और तभी लागू हुआ। तब मद्रास (अब चेन्नई), बॉम्बे (अब मुंबई ), कलकत्ता (अब कोलकाता), लाहौर (अब पाकिस्तान में) और रंगून (अब यांगून, बर्मा में) सेंसर बोर्ड पुलिस चीफ के अंडर में था। पहले रीजनल सेंसर्स स्वतंत्र थे। स्वतंत्रता के बाद रीजनल सेंसर्स को बॉम्बे बोर्ड ऑफ फिल्म सेंसर्स के अंडर लाया गया। सिनेमेटोग्राफ एक्ट, 1952 लागू होने के बाद बोर्ड का ‘सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सेंसर्स’ के नाम से पुनर्गठन हुआ। 1983 में एक्ट में कुछ बदलाव के बाद इस संस्था का नाम ‘सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन’ रखा गया।

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